बॉलीवुड में सलमान खान सबसे चहेते एक्टरों में से एक हैं। साथ ही उनके जैसा फेमस स्टार भी यह मानता है कि उम्र के इस पड़ाव पर ही हम जैसै हीरो को ज्यादा महेनत करनी पड़ती है। सलमान खान की फिल्म सुलतान ईद के दिन ऑडियंस के सामने आ रही है। हर बार की तरह इस बार भी अपने चाहने वालों का दिल जीतने के लिए वे तैयार हैं। तो चलिए फिल्म सुलतान के बारे में और इस फिल्म को लेकर उन्होंने कितनी महेनत की, यह हम आपको बताते हैं-
– सुलतान के बारे में कुछ बताइए?
क्या फिल्म है। बजरंगी भाइजान के वक्त हम पाकिस्तान मे चले गए थे, अब उससे वापस आ जाओ। यह एक फैमिली फिल्म है। सिर्फ फैमिली के बीच रहना है। बाकी फिल्मों की तरह इसमें भी रोना-धोना होगा।
– सुलतान के लिए क्या तैयारियां की और कितना मुश्किल रहा रेसलर बनना?
रेसलर में स्फूर्ति होना बहुत जरूरी होता है। उनकी ही तरह ट्रेनिंग भी लेनी पड़ती है। मुझे मिट्टी की पहलवान की ट्रेनिंग और मार्शल आर्ट दोनों सीखना पड़ा, क्योंकि फिल्म में पहले मेदान की कुश्ती और फिर रिंग में पहलवानी दिखाई गई है। शूटींग के दौरान जो छह-सात घंटे उठा पटक होती थी, वह सबसे दिक्कत वाली बात थी। बोडी बना सकते हैं, पर 120 किलो के आदमी को दस दस बार उठाके पटकना काफी मुश्किल रहता था। मैं यह शूटिंग के दौरान 10 बार करता था। रेस्लिंग रेस में फिर से 1-2 बार होता था। डिफरेंट फाइट में कई बार होता था। मैं ऐसा करीब सात घंटे करता था। मैं उसको उठाता व पटकता और वह मुझे उठाता व पटकता था।
– आप इस फिल्म से पहले किस पहलवान को जानते व किसी के बारे में सुना था?
हां, मैंने तो सिर्फ गामा पहलवान के बारे में सुना था और मेरे हिसाब से वह सबसे बड़ा पहलवान है। उसके बाद हमारे दारासिंहजी थे। मेरा फेवरेट पहलवान गामा पहेलवान हैं।
– क्या सुलतान पहलवान ने गामा पहलवान को इस फिल्म में फॉलो किया है?
मैंने अपने पिता से गामा पहलवान के बारे में काफी कहानियां सुनी थीं। वैसे मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र और देश में कई जगह रेसलिंग के लिए जानी जाती है। काफी मैचेस भी होते हैं। मेरा एक इंदौर का दोस्त और मेरे चाचा भी रेसलिंग से जुड़े हुए हैं। वे फाइट नहीं करते, पर अखाड़ा रोजाना रेग्यूलर जाते हैं। मार्शल आर्ट की प्रेक्टिस करते और कराते हैं।
– ट्रेनिंग के लिए आपके कोच कौन थे?
दिल्ली के रहने वाले एक जगदीश जी हैं। उनके फादर को इसी में नेशनल टाइटल भी मिला था। यह फिल्म एक रेसलर पर है। शूटिंग लुधियाना औप चंदीगढ़ में हुई थी। उनके ट्रेनर के साथ मैं फाइट सीन करता था, जिन्होंने 426 मैच साथ किए थे। पहले दिन जब चंदीगढ़ मे शूटिंग थी तो उन्होंने मुझे उठा लिया। दूसरे दीन दूसरे ने मुझे उठा लिया, फिर बाद में मैं भी उन्हें उठाकर घूमा था।
– इसकी कहानी आपको कैसै इन्सपायर करती है?
इस फिल्म में फिजिकल ट्रेनिंग आजकल ज्यादा अहमियत नहीं रखती। साथ में टेक्नोलॉजी भी इतनी आगे बढ़ गई है कि किसी को भी कोई भी शेप में दिखा सकते हैं। सबसे महत्वपूर्णबात फिल्म की स्क्रिप्ट है और उस पर हमने सबसे ज्यादा वर्क किया है। फिल्म में लंगोट पहना दो या रेसलिंग के कॉस्ट्यूम पहना दो, यह मायने नहीं रखता। एक रेसलर को अपने आप को साबित करना होता है और वह जो अपने आपको चेलेंज देता है, वह जरूरी है। फिल्म का प्लॉट क्या है, यह ज्यादा जरूरी है। जिंदगी में वह जब हार जाता है, अकेला होता है और फिर से उठता है और सफल होकर दिखाता है, यह महत्व की बात है। कितनी फाइट्स है, यह स्टोरी नहीं है। स्टोरी के अंदर ही फाइट है। इस फिल्म में कोई विलेन नहीं है। सब एमएमएम के फाइटर्स है। फिल्म में सब फाइटर ओरिजनल हैं, जो मेरे साथ लडत़े दिखाई देंगे। मैं पर्सनमै पर्सनली इस स्टोरी के बारे में कहूं तो हर रेसलर जो रिंग के अंदर लड़ता है, उसको जीतना है, नाम कमाना है, पैसे कमाने हैं। यह स्टोरी सबकी है।
– रेसलर को कितना नजदीक से जान सके?
एक अच्छा रेसलर बचपन से फाइट करता है। मुझे पता चला कि कुछ तो चार-पांच साल की उम्र से ही रिंग में लडऩे जाते हैं। मेरे साथ जो शूटिंग पर थे, उनको कब कैसे सामने वाले को मारना है, वह पता होता है। हमारे जो स्टंट मैन फिल्मों में होते हैं, वे खुद ही उछलते और गिरते हैं। पर रेसलर को उठाना पड़ता है और पटकना पड़ता है। इनको जहां मौका मिलता है तो यह कभी पेट फुलाते कभी मुंह फुलाते थे। यह भूल जाते थे कि शूटिंग पर हैं। जव वह फाइट करते हैं तो उनको सब पता होता है। ऐसे लोगो के कॉन्टेक्ट में मैं आया। सब मिलकर मुझे अच्छा खासा धोते थे।
– मेधा पांड्या भट्ट

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